शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

पंडित या कॉमरेड (जैसी जिसकी रुचि)!!! श्रीराम तिवारी जी के व्यक्तिव के तीन आयाम (जन्मदिन विशेष)


गूगल बाबा (पांडित्य प्राप्त करने की सही परिभाषा)

प्रवीण जी देशभक्ति पर संस्कृत में कोई श्लोक जानते हैं क्या? मैंने कहा मैं नहीं जानता मेरे गूगल बाबा जानते है। अरे प्रवीण जी गूगल पर नहीं मिल रहा तभी तो पूछा। मैंने फिर कहा मेरे गूगल बाबा अलग है ...एक मोबाइल नंबर है... जिस पर सिर्फ अपना सवाल बता दो.. साहित्य, विज्ञान, अध्यात्म, राजनीति या कोई भी विषय.. आपको जवाब मिल जाएगा। आश्चर्यजनक... मैं तो ऐसे किसी नंबर के बारे में नहीं जानता। ... कोई बात नहीं ये लीजिए नंबर.. फोन करिए आपको परिचय भी नहीं देना होगा और जानकारी मिल जाएगी। कुछ अविश्वास के साथ मेरे मित्र ने फोन किया.. और प्रणाम कहकर अपना सवाल पूछा.. कुछ देर में उन्हें जानकारियां मिल गईं। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उत्साह से उन्होंने पूछा अरे अब तो बता दीजिए कौन ज्ञानी हैं ये? मैंने इतराते हुए, गर्व और अहंकार की मिश्रित अनुभूति के साथ कहा मेरे पिताजी हैं.. और उनका नंबर मेरी मित्र मंडली में कई लोगों के पास है। जब जिसे जो जानना होता है या कुछ लिखना होता है तो उन्हें फोन घुमाकर बतिया लेता है..काफी जानकारियां मिल जाती हैं... पिताजी की हजारों किताबों का संकलन बचपन से देखता आया.. आश्चर्य होता था कोई कैसे इतना पढ़ सकता है.. यही वजह रही मुझे कभी किताबों को पढ़ने का मन नहीं किया और सच पूछिए तो जरूरत भी महसूस नहीं हुई। इसे आप वंशानुगत बीमारी कह सकते हैं अब मेरे पास भी ऐसा ही संकलन है लेकिन पढ़ता अब भी नहीं.. जब सुनना होता है तो गूगल बाबा को फोन घुमा लेता हूं... पिताजी बचपन से ही समझाते रहे तिवारी, मिश्रा, दूबे.. आदि इत्यादि होने से कोई पंडित नहीं होता.. पांडित्य अध्ययन से और उसे बांटने से आता है.. मुझे खुद से तो ऐसी किसी प्रतिभा के विकसित होने की कोई उम्मीद या महत्वकांक्षा नहीं लेकिन निश्चित तौर पर मैं अपने पिता के व्यक्तित्व में ये एक दैवीय पांडित्य मानता हूं जो उन्हें जन्मजात प्राप्त है....


अपने आदर्शों से कोई समझौता नहीं (कड़क मिज़ाजी)

इनके मिज़ाज से इन्हें दूर से जानने वाला भी वाकिफ है। कोई कुछ भी कहे, चाहे जितना मना करे... जो मन में है वो कह कर रहेंगे.. कोई बुरा माने भला माने कोई फर्क नहीं पड़ता। पापा के एक अजीज मित्र थे जो अब नहीं रहे.. चाचा ने धनोपार्जन के मामले में अपने सभी सहयोगियों को पीछे छोड़ दिया था.. लेकिन पिताजी के पास हफ्ते में एक बार बैठने जरूर आते थे.. बस पापा को सुनते रहते थे (जैसा ज्यादातर लोगों को करना पड़ता है).. मैं इत्तेफाक से इंदौर में था.. चुटकी लेने के लिहाज से मैंने उनके सामने पापा से कह दिया.. देखा पापा आप ने भी व्यवसाय सीख लिया होता तो आज अंकल की तरह गाड़ी और बंगला बना लिया होता.. पापा भी .. हूंssss… वाली मुद्रा में आ गए.. इतने में अंकल खड़े हुए और पापा के पीछे जाकर खड़े हो गए.. हाथ जोड़कर मुझसे बोले... बेटा मैं जानता हूं तू मजाक में ये कह रहा है लेकिन मेरे जीवन की उपलब्धि बस इतनी है कि इस इंसान के पीछे खड़े होने का मौका मिला है.. ये कभी गाली भी बक देते हैं तो लगता है आशीर्वाद मिल गया... इनके सामने धन क्या है.. इनकी बराबरी के बारे में तो सोचना भी पाप है.. अब पापा मुस्कुराए और मुझे देखते हुए बोले.. मैंने ये कमाया है और तुमसे भी यही कमाने की उम्मीद करता हूं.. जो पापा के मिज़ाज को समझ गए वो सचमुच भाग्यशाली हो गए और कड़क मिज़ाजी से बिदक जाने वाले अभागों की तो लंबी लिस्ट है.. पर जो अपने आदर्शों से समझौता नहीं करता उसके साथ रहने का तो बस एक ही तरीका है समर्पण..

वसुधैव कुटुंबकम (परिवार की विस्तारित संकल्पना को मानने वाले)

मेरे सभी मित्र मेरे पापा से आज भी पापा ही कहते हैं.. श्याम ऐसा मित्र था जो सामाजिक रूप से भी अपने पिता का नाम श्रीराम तिवारी ही बताता था और कहता था उन्हें पिता कहने का सौभाग्य छोड़ना नहीं चाहता उसकी ये बात सुनकर मुझे अपने सौभाग्य का एहसास होता था.. दुर्भाग्य से श्याम अब नहीं रहा लेकिन उसका मेरे पिता के लिए सम्मान अब भी मन में है.. पापा भी मेरे मित्रों पर वहीं अधिकार और व्यवहार रखते हैं जो मुझ पर.. फिर चाहे एक समय सबकी पिटाई की बात हो या उनके खौफ से उन्हें कहीं देखकर दोस्तों का भाग खड़े होना हो.. निश्चित तौर पर अपने छोटे भाई परशुराम तिवारी (जिन्हें वो अपना बड़ा बेटा ही मानते हैं), मेरी बहन अनामिका, मेरी और मेरे भांजे अक्षत को तो उन्होंने बेहतरीन परवरिश और शिक्षा दीक्षा दी ही.. साथ ही जो मुमकिन हो सका वो उन सभी के लिए शिक्षा के क्षेत्र में किया जो उनके संपर्क में आए.. उनके कड़क स्वभाव से हम सभी परेशान भी हुए हैं.. कठोर अनुशासन और अपने हिसाब से ही हर चीज को चलाना उनकी पहचान है और इससे वो समझौता नहीं करते... चाहे आप बुरा माने या भला माने.. चाहे आप साथ हो या न हो..

मेरी और पापा की राजनैतिक विचारधारा कभी नहीं मिली.. पिताजी की राजनैतिक विचारधारा की विरासत मेरे चाचा परशुराम तिवारी जी को मिली.. लेकिन चाहे मेरे प्रिय मामाओं की एकदम अलग विचारधारा हो या मेरी अपनी राजनैतिक विचारधारा हो हमें अपने घर में ही अपनी धार तेज करने का मौका मिला.. अच्छी बात ये है कि मुझे चाहे तीखे जवाब ही मिले हों लेकिन तार्किक जवाब रहे हैं जो मुझे खुद को बेहतर करने में और सहयोग करते हैं.. ये भी सच है कि उनके कठोर अनुशासन और गुस्से के पीछे बहुत जल्दी शांत हो जाने वाला एक चित्त भी है.. जिसे मेरी मां उर्मिला तिवारी से बेहतर कोई नहीं जानता और यही बात है कि ये जोड़ी सबसे जुदा दिखने के बावजूद भी सबसे ज्यादा परफेक्ट है.. उफ्फफ क्या क्या लिख देना चाहता हूं लेकिन वो मेरे मन के भाव हैं.. कुल मिलाके सब बातों को समेट लूं तो एक ही बात समझ आती है... मैं बहुत सौभाग्यशाली हूं जो मुझे ऐसे पिता मिले... मेरे जीवन में अध्यात्म का प्रवेश भी बहुत छोटी उम्र में अपने पिता को देखकर ही हुआ.. उनके जनवादी लेखन और संस्कृत वांग्मय पर पकड़ ने मुझे सहजता से बहुत कुछ सीखने में मदद की और ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहे ऐसी अपने कुल देवता ठाकुर बब्बा और सबके पालनहार और संहारक बाबा महाकाल से अभिलाषा है.. यहां तक मेरे मन के भावों को पढ़ने के लिए ह्रद्य से धन्यवाद...

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

आत्म जगत या चेतना जगत कैसा होता है? क्या मृत्यु के बाद भी कुछ रहता है? स्वामी गंगाराम जी के उत्तर

मृत्यु के बाद क्या होता है? ये एक ऐसा प्रश्न है, जो ज्यादातर लोगों के लिए एक अनसुलझी
पहेली ही बना रहता है। अज्ञानतावश हमने इस जगत की कई कपोल कल्पनाओं या किस्से
कहानियों को ही सत्य मान लिया है। हमारे उपनिषद सूक्ष्म जगत का विश्लेषण करते हैं।
वैज्ञानिक भी सदैव से सूक्ष्मतर विषयों पर से परदा उठाने की कोशिश करते रहे हैं।
सूक्ष्मतम जगत का अंत निश्चित तौर पर एक ऐसी अवस्था पर होगा जहां कुछ भी शेष न रह
जाए, लेकिन वहां तक भौतिक संसाधनों से पहुंच पाना शायद कभी संभव न हो पाए।
स्वामी
गंगाराम आत्म जगत का विश्लेषण सूक्ष्म जगत के अनुसंधान से करते हैं।




वे कहते हैं, जल की तीन अवस्थाएं हैं ठोस, द्रव्य और वाष्प। ठोस में
जड़ता अधिक है, द्रव्य में उससे कम और वाष्प में उससे कम। जो जितना सूक्ष्म या कम
जड़ता वाला है वो उतना शक्तिशाली है। पत्थर में जीवन शक्ति नहीं है, पानी में है
और वाष्प में उससे भी ज्यादा। निश्चित तौर पर इस अवस्था से भी कई गहरी सूक्ष्मतम
अवस्थाएं हैं जिन तक विज्ञान नहीं पहुंच सकता लेकिन हम पहुंच सकते हैं।

विज्ञान जब हिग्स बोसोन की खोज में पसीना बहा रहा है तब आप उससे भी
सूक्ष्म विचार जगत का अनुसंधान अपने भीतर ही कर सकते हैं। ये विचार और इससे बने बुद्धि
और मन से जीव की रचना होती है और यही जीव आत्म तत्व का आवरण बन जाता है। यदि वासना
रहित जीवन से विचारों को शुद्ध नहीं किया जाता है और आत्म तत्व को जीव से मुक्त
नहीं किया जाता है तो वो शरीर के बाद भी अपनी वासनाओं के साथ विचरण करता है और नई
योनी की तलाश करता है। जैसी वासानाएं शेष रहती हैं वैसा ही शरीर दोबारा मिलता है।
यदि इच्छारहित होकर आत्म तत्व को परमात्व तत्व में विलीन होने दिया जाए तो कैवल्य,
मोक्ष या ब्रह्म आदि शब्दों से निरुपित की गई अवस्था की प्राप्ति हो जाती है। जब
तक देह में हैं तब तक तो ज्ञानी या सत्य को प्राप्त व्यक्ति भी भौतिक जगत में अपने
भौतिक शरीर को लेकर दंड ही भोगता है। पहले जीव और फिर देह समाप्त होगी इसके बाद ही
परमात्मा में विलय होगा। कबीर कहते हैं,
देह धरे का दंड है, सब काहू को होय


ज्ञानी भुगते ज्ञान से, मूरख भुगते रोय


बुधवार, 28 जून 2017

अद्भुत, अविस्मरणीय, महाकाल की कृपा से हुई एक मुलाकात का संक्षिप्त संस्मरण

बापू का हस्त लिखित असली पत्र, प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू के लिखे पत्र, सुभाष बाबू की उज्जैन में ली गई दुर्लभ तस्वीर ये सारी चीजें एक साथ देखने को मिल जाएं तो आपका बल्लियों उछल जाना लाजिमी है।
बापू (महात्मा गांधी) द्वारा लिखे गए पत्र की मूल प्रति

मेरे साथ भी आज यही हुआ। जब एक बड़े सरकारी अधिकारी के कैबिन में एक अनौपचारिक मुलाकात के लिए घुसा तो हाथ में अपनी दो किताबें थी। लेखक हूं, पत्रकार हूं, ये हूं वो हूं का बहुत सारा पानी चढ़ा हुआ था। थोड़ी देर ही हुई कि सारा पानी उतर गया। बैठने के बाद एक किताब देखकर हैरान रह गया। 

भगत सिंह की जेल डायरी, ये मेरे पिता की किताबों के कलेक्शन में बहुत सालों से है। जिस शख्स से मिलने गया था जानता भी नहीं था कि वो इसके रचयिता हैं। यही नहीं अब तक करीब साठ किताबें लिख चुके हैं। भगत सिंह और स्वामी विवेकानंद पर लिखी गई उनकी वृहद रचनाएं ज्ञानपीठ लगातार छाप रहा है। धर्मयुग के लेखक तो रहे ही साथ ही जिस जमाने में लोग मीडिया नहीं जानते थे तब वे रशिया और जापान के प्रतिष्ठित अखबारों से जुड़ चुके थे।

राजेंद्र बाबू (राजेंद्र प्रसाद जी) द्वारा लिखे
गए पत्र की मूल प्रति

ये सब तो एक शख्स को शख्सियत बना ही देता है लेकिन जैसे ही आप जानते हैं कि वो एक समृद्ध विरासत और धरोहर को आगे बढ़ा रहे हैं तो उत्साह दो गुना हो जाता है। जब जाना कि देश की आजादी का दिन और वक्त उनके पिता ने तत्कालीन बड़े नेताओं के बीच बैठकर निकाला था तो खुद के सौभाग्यशाली होने का और अनुभव हुआ। सिर्फ बातों तक ही बातें सीमित नहीं रहीं बल्कि वो सारा पत्राचार भी मेरे सामने था जो बापू, राजेंद्र बाबू, मोरारजी और कई अन्य बड़े नेताओं और उनके पिता के बीच हुआ था। कालीदास की धरोहर और विक्रमादित्य की शान को बनाए रखने और बचाए रखने में भी जिनका अविस्मरणीय योगदान था। 
मैं बात कर रहा हूं आधुनिक युग के आर्यभट्ट कहे जाने वाले महान ज्योतिष पं. सूर्य नारायण व्यास जी की और आज मुलाकात हुई उनके यशस्वी और अत्यंत ओजवान पुत्र राजशेखर व्यास जी से। 
आधुनिक युग के आर्यभट्ट पं. सूर्यनारायण व्यास जी


गागर में सागर वाली मुलाकात थी ऐसा लगा कि आज, महाकाल के उपासक रहे पं. सूर्य नारायण व्यास जी का ही आशीर्वाद मिल गया हो। पिताजी को फोन पर जानकारी दी तो ये जानकर और अच्छा लगा कि पिताजी खुद पं. का आशीर्वाद लेने कई बार उज्जैन जा चुके थे। आज की पीढ़ी को ऐसे लोगों के बारे में ज्यादा से ज्याद जानने की आवश्यकता है उम्मीद है मैं इसमें अपना कुछ योगदान दे पाऊंगा। वाह अद्भुत अविस्मरणीय। 

पं. राजशेखर व्यास जी से आशीर्वाद लेते हुए                  पं. जी पर डाक टिकट जारी करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री
                                                                    श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

पद्म श्री डॉ. नरेंद्र कोहली के सत्य की खोज पर विचार

आप किसी को गुरु माने से ज्यादा आवश्यक है योग्य गुरु आपको शिष्य मानें.. आध्यात्मिक जगत में स्वामी गंगाराम जी ने ये सौभाग्य दिया तो लेखक के तौर पर साहित्य जगत में वर्तमान दौर के सबसे प्रतिष्ठित नाम और पद्म श्री से सम्मानित किए गए डॉ. नरेंद्र कोहली का प्रेम और आशीर्वाद सदा मिलता रहा है.. सत्य की खोज किताब की शुरुआत में कुछ अध्याय उन्हें भेजे थे। जिन्हें उनका स्नेह प्राप्त है वो जानते हैं कि उनकी हास्य विनोद की क्षमता अप्रतिम है। उन्होंने कहा बड़ी जल्दी वो काम कर रहे हो जो हमें करना चाहिए। फिर कहा कुछ लिखकर भेजूंगा। वो सिर्फ औपचारिकता में किसी आलेख या पुस्तक को नहीं पढ़ते बल्कि पूरा समय देकर गंभीरता से उस पर विचार करते हैं। ऐसी ही अपेक्षा उनकी अपनी पुस्तकों को लेकर भी रहती है। उन्होंने जो मेल कुछ दिनों बाद भेजा वो भी किसी बड़े सम्मान से कम नहीं था। उसे अपने पास संजोकर रखा है। आज जब उनके शुभचिंतक उन्हें पद्म श्री मिलने की खुशियां मना रहे हैं.. उनके मेरे लिए कहे गए ये शब्द और भी अहम लग रहे हैं। अपनी बढ़ाई किस को पसंद नहीं और फिर वो डॉ. कोहली के शब्दों में हो तो क्या बात। हम ही क्या हमारे पिताजी भी नरेंद्र कोहली जी के साहित्य को अपनी धरोहर समझते रहे हैं और जब उनके शब्दों में अपने किसी लेखन की तारीफ मिले तो अहसास क्या होगा, शब्दों में बयां करना मुश्किल होगा। राज्य सभा टीवी के कार्यक्रम शख्सियत में उनके बारे में मुझसे भी विचार लिए गए और इस कार्यक्रम में उन्होंने जो बात मेरे बारे में कही वो भी दिल को छू लेने वाली थी.. ये कार्यक्रम तो इंटरनेट पर आपको मिल जाएगा.. फिलहाल उनका भेजा वो मेल साझा कर रहा हूं जो उन्होंने सत्य की खोज की शुरुआत में मुझे लिख कर भेजा था।

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

मैं जानता भी नहीं था कि मेरे बाजू वाली सीट पर बैठा वो शख्स इतनी बड़ी शख्सियत है!


प्लेन की यात्रा में अगली पंक्ति का टिकट था। सीट बीच वाली थी। प्लेन में घंटे भर की यात्रा करनी होती है फिर भी बीच वाली सीट को लेकर हीन मनोदशा पता नहीं क्यूं हो जाती है। मैं खड़ा खड़ा सीट बदलने की योजना बना रहा था क्यूंकि कुछ पीछे ही हमारे सीनियर दीपक चौरसिया बैठे थे। सोचा उनके साथ बातचीत करते हुए जाने का मौका मिल जाएगा। खड़े खड़े विचार कर ही रहा था कि जो सज्जन विंडो सीट पर थे वो आए और मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा क्या मैं अपनी सीट पर बैठ जाऊं। बहुत सौम्य चेहरा और सौम्य आवाज, मैंने कहा जी जरूर। फिर मैं भी सोचते विचारते अपनी मिडिल सीट पर बैठ गया। इतने में आइल सीट पर बैठे सज्जन आ गए। उन्होंने आते ही जोरदार आवाज के साथ मेरे साथ बैठे सज्जन का अभिवादन किया और उनके पैर छुए। इसके बाद उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि क्या मैं मिडिल सीट पर बैठ सकता हूं। नेकी और पूछ पूछ मैं तो उधार ही बैठा था। खैर सीट की अदला बदली हो गई। इसके बाद अब मिडिल सीट पर बैठे सज्जन ने अपना फोन निकला और विंडो सीट पर बैठे सज्जन के साथ सेल्फियां खींचने लगे। मुझे उनके बातचीत के अंदाज और उनके प्रति दिख रहे उत्साह से लगा कि हो न हो मेरे बाजू में बैठे सज्जन कोई खास व्यक्ति हैं। मैंने मिडिल सीट वाले भाई साहब से पूछा ये हैं कौन? उन्होंने कान में फुसफुसाते हुए कहा देश के रक्षा राज्य मंत्री।


डॉ. सुभाष भामरे के बारे में मैं बहुत नहीं जानता था लेकिन वो एक बेहतरीन डॉक्टर रहे हैं और कैंसर के प्रति उन्होंने जागरुकता का बड़ा अभियान चलाया था और साथ ही वो मोदी कैबिनेट के सबसे बेहतरीन मंत्रियों में शामिल हैं, इतनी जानकारियां मुझे थीं। सीट बदलने पर थोड़ा सा निराश हुआ लेकिन अब भी ज्यादा दूर नहीं था मेरे और मंत्री जी के बीच वही सज्जन थे जिनसे मुझे उनके बारे में जानकारी मिली। वो भी मराठी मूल के थे और रक्षा राज्य मंत्री भी धुले के सांसद हैं और महाराष्ट्र के काफी लोकप्रिय नेता भी हैं। दोनों की बातें चल रही थीं और मुझे भी मराठी का थोड़ा बहुत ज्ञान होने से बातचीत में दिलचस्पी हो रही थी। मैंने बातचीत के बीच में अपना सिर घुसाया और पहले तो मंत्री जी को नहीं पहचानने के लिए उनसे माफी मांगी। हंसते हुए ये भी कहा कि मोदी कैबिनेट के इतने बड़े मंत्री बाजू वाली सीट पर बैठे होंगे इसका जरा भी गुमान नहीं था। फिर उनसे पूछा कि क्या अब प्रैक्टिस कर पाते हैं? क्यूंकि मूलतः वो एक डॉक्टर हैं। उन्होंने जवाब दिया इस मंत्रालय में आने के बाद तो बिलकुल भी नहीं, जिम्मेदारियां बहुत हैं।
अब बारी मेरी थी। डॉ. भामरे को मैंने अपना परिचय दिया। एक घंटे से ज्यादा का वक्त था और मेरे भीतर सवालों की कोई कमी नहीं थी। बातों बातों में मेरी पुस्तकों के बारे में चर्चा निकली और ब्लूम्सबरी के साथ प्रकाशित होने वाली पुस्तक के बारे में भी कुछ जानकारियां उन्हें दी। वो इसके विषय को सुनकर बहुत उत्साहित हो गए। उन्होंने कहा मुझे इसकी पहली प्रति जरूर देना। इसकी विषय वस्तु उनकी दिलचस्पी का विषय है। इस पुस्तक के बारे में तो मैं आपको आगे कभी विस्तार से बताऊंगा ही लेकिन इस लंबी यात्रा के बाद उनके व्यक्तित्व का एक बेहतरीन पहलू सामने आया जिसकी वजह से मैंने इस मुलाकात पर इतना लंबा ब्लॉग लिखने का मन बनाया। यात्रा खत्म होने को थी मैंने संकोच के साथ पूछा प्लेन के बाहर तो आप तक पहुंचना बहुत कठिन होगा। किताब लेकर कैसे पहुंचूंगा आप तक? क्या रक्षा मंत्रालय के जरिए संपर्क करूं? उन्होंने हंसते हुए कहा हां ये तो एक बढ़िया तरीका है ही लेकिन आप मेरा पर्सनल नंबर भी रख सकते हैं। बातें करते करते कैसे एक घंटा बीत गया पता ही नहीं लगा।

प्लेन के लैंड करते ही बारी थी उनका प्रोटोकॉल देखने की। मैंने तो ये देखा है कि हम जैसे छोटे मोटे पत्रकारों को भी कई बार सीआईएसएफ के भाईयों की वजह से कुछ विशेष ट्रीटमेंट मिल जाता है फिर रक्षा राज्य मंत्री के लिए तो विशेष सुविधाएं निश्चित तौर पर होंगी। हम प्लेन से नीचे उतरे तो मैंने सोचा उन्हें उनकी कार तक छोड़ देता हूं फिर बस से आगमन स्थल तक पहुंच जाऊंगा। मुझे आश्चर्य तब हुआ जब वो मेरे ही साथ सीधे बस में चढ़ गए। मैंने भी उनसे पूछ लिया आप बस में क्यूं जा रहे हैं? उन्होंने कहा क्यूं नहीं जैसे सब जा रहे मैं भी जाऊंगा। मैं उनसे प्लेन में हुई लंबी बातचीत के बाद उनकी सहजता और विजन का जबरदस्त कायल हो ही गया था लेकिन उनकी सादगी ने मुझे और प्रभावित किया। आम तौर पर इस तरह के प्रशंसा पत्र को चाटूकारिता माना जा सकता है लेकिन मुझे सचमुच ये कहने में कोई परहेज नहीं कि टीम मोदी में कई ऐसे चेहरे हैं जो सचमुच जिम्मेदारियां उठाने के काबिल हैं। डॉ. सुभाष भामरे की योग्यता को उनके बस में बैठने भर से नहीं तौला जा रहा बल्कि एक डॉक्टर के तौर पर कामयाब रहने के बाद राजनीति और फिर देश के बड़े मंत्रालय तक बेदाग तरीके से पहुंचने की उनकी यात्रा भी उनकी योग्यता का प्रमाण हैं। मैं उन्हें अपनी किताब की पहली प्रति दे पाऊंगा या नहीं ये कहना तो मुश्किल है। उनके पर्सनल नंबर पर मुझे जवाब मिलेगा या नहीं ये कहना भी मुश्किल है, लेकिन उनके साथ घंटे भर की हवाई यात्रा के बाद की गई कुछ मिनटों की बस यात्रा को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा।


रविवार, 29 जनवरी 2017

मूर्ख हैं वो इतिहासकार जो पद्मावती को काल्पनिक किरदार कहते हैं


हमारे आज के इतिहासकार जो कर रहे हैं वहीं पुराने इतिहासकारों ने भी किया। इरफान हबीब और नजफ हैदर जैसे इतिहासकारों ने पद्मावती को काल्पनिक किरदार तक कह डाला। यदि इनके नजरिए से इतिहास को खंगालने बैठे तो बाबर के आने के बाद इतिहास में की गई छेड़खानी और अंग्रेजों से हमारे संघर्ष तक बात आकर सिमट जाती है। भला हो हमारे उन महान साहित्यकारों का जिनकी वजह से आज भी हम राम, कृष्ण और वैदिक परंपरा में अपने इतिहास को पा लेते हैं वरना हमारी हालत तो वो कर दी गई की हम बाबर के हमले के बाद ही अपने अस्तित्व को मानें। रही सही कसर हमारे उन कथित अपनों ने पूरी कर दी जो खुद भी विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव में आ गए। जब अपने कुछ कहते हैं तो लोग विश्वास करते हैं और यही वजह है कि इनका इस्तेमाल जमकर इतिहास के पुराने पन्नों को मिटाने के लिए किया गया। इस सबके बीज मलिक मुहम्मद जायसी जैसे सूफी भी हुए जिन्होंने इतिहास को साहित्य के नजरिए से लिखा। उनकी वजह से इतिहास के कुछ पन्ने आज भी हमारे पास मौजूद हैं। ऐतिहासिक किताबों में जिनका जिक्र नहीं वो किरदार कभी हुए ही नहीं ये कहना उतना ही गलत है जितना अपने पर दादा की तस्वीर नहीं होने पर उनके अस्तित्व को खारिज कर देना।

इतिहास किस्सों कहानियों और साहित्य से ही आगे बढ़ता है। रामचरित मानस सिर्फ साहित्य की अप्रतिम रचना मात्र नहीं है, हर भारत वासी के लिए उसके गौरव पूर्ण इतिहास की साक्षी भी है। वाल्मिकी रामायण को परंपरागत अवधी भाषा में गोस्वामी ने लिखकर बदलते वक्त में भी उस इतिहास को जिंदा रखा। महाभारत महज साहित्यिक रचना नहीं है वो हमारे समृद्ध इतिहास का लेख जोखा है। सिर्फ कहानियों तक सिमट जाना बेवकूफी है। हमारे असली साहित्यकारों ने किस तरह से इतिहास को कलात्मकता के साथ पेश किया इस पर गौर करने की जरूरत है। हमारे इतिहास से एक बात तो साफ है कि हम आस्था से भरपूर हैं।  आस्था ही हमारे अस्तित्व का मूल है। इस आस्था पर न तो पहले कोई चोट कर पाया न आज कर सकता है और न हीं भविष्य में कोई कर पाएगा। यही साहित्य या इतिहास हमें मुगलों और अंग्रेजों के हमलों के बावजूद अपनी परंपरा से जोड़े रखता है।
इस इतिहास को जो नहीं समझते उन्हें भारतीय इतिहास पर टिप्पणी करने की कोई जरूरत नहीं है। वे वही काम कर रहे हैं जो मुगलों के इतिहासकारों ने अपने आकाओं को पहचान दिलाने के लिए किया था। दरअसल इतिहास आईना दिखा देता है और इतिहास वर्तमान आस्थाओं से भी जुड़ा होता है। वो लोग जो सनातन सभ्यता को खत्म करने के लिए आए थे क्या ऐसा इतिहास लिखेंगे जो सनातन सभ्यता के गौरव को बताए? जाहिर तौर पर इतिहास को भुलाने का भरसक प्रयास किया गया लेकिन जहां ज्ञानी पैदा होते हैं वहां आक्रांताओं की तिकड़मे काम नहीं आती। ये ज्ञानी व्यास, तुलसी और वर्तमान समय में विवेकानंद जैसे लोग हुए जिन्होंने इस सनातन सभ्यता के सही इतिहास को जिंदा रखने का सफल प्रयास किया। दुनिया की किसी सभ्यता का इतिहास उतना अक्षुण नहीं रह सकता जितना हमारा है। हम जानते हैं कि योग हमारे ज्ञानियों की देन है, हम जानते हैं जिसे आज फिलॉसफी कहते हैं वो हमारे इतिहास की देन है। विदेशी आक्रांताओं ने यहां से चुरा चुरा के अपना नया इतिहास तो गढ़ लिया लेकिन हमारे मूल तत्वों पर चोट नहीं कर पाए।
ये सच है कि साहित्यिक रचनाओं में कवि या साहित्यकार को अपनी कल्पनाओं को भी रखने की छूट मिलती है। आज के दौर के लेखक नरेंद्र कोहली या ईशान महेश जैसे लोग आज भी राम कृष्ण और सुदामा जैसे किरदारों को लेकर अपने उपन्यास लिखते हैं। इसमें उनकी कल्पनाएं होती हैं लेकिन ऐतिहासिक तत्वों को जस का तस लिया जाता है। सीता-राम या राधा-कृष्ण का प्रेम हो या फिर हनुमान जी की भक्ति हो इसका मूल तत्व कभी कोई नहीं बदल पाएगा। तुलसी ने भी इसे ऐसे ही लिए उनसे पहले वाल्मिकी ने भी। आज के साहित्यकार भी नई कल्पनाएं गढ़ते हैं लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कोई छेड़छाड़ कर ही नहीं सकता क्यूंकि उसे पाठक स्वीकार ही नहीं कर पाएंगे। रानी पद्मावती के सौंदर्य को लेकर या उनके तोते को लेकर या उनके जीवन को लेकर कई बातों पर जाएसी ने अपनी कल्पनाओं को भी उकेरा होगा लेकिन इस तथ्य को कोई नहीं बदल सकता कि मुगल आक्रांताओं की नजर हिंदू राजाओं की रानियों पर रहती थी। ये दरअसल इन घटिया आक्रांताओं की हवस मात्र नहीं बल्कि किसी राजा और उसकी प्रजा को नीचा दिखाने की एक राजनीतिक साजिश भी होती थी। मेवाड़ के महाराज रावल रतन सिंह की 15 रानियां थीं जिनमें सबसे छोटी पद्मावती थीं। वो अत्यंत रूपवान थीं और अलाउद्दीन खिलजी ने मेवाड़ की प्रजा  के मानस को छलनी करने के लिए उन पर कुदृष्टि डालने का असफल प्रयास भी किया था। अन्य गरिमामयी रानियों की तरह उन्होंने भी प्रजा का मान रखने के लिए जौहर कर लिया था। ये एक ऐसा काला इतिहास है जो खिलजी के किसी वंशज को आज भी पचता नहीं है। ये इतिहास बताता है कि ये आक्रांता किस घटिया मानसिकता के साथ हमारे पवित्र देश में आए थे।
जाएसी ने बेशक पद्मावती के रूप पर पूरा साहित्य लिख दिया इसमें उनकी कल्पनाएं भी हो सकती हैं लेकिन कुछ तथ्य ऐसे हैं जिन्हें वो भी नहीं बदल सकते थे। इन सब तथ्यों में सबसे महत्वपूर्ण ये है कि रानी पद्मावती एक शौर्यवान और गरिमामयी रानी थीं जिनके लिए सम्मान उनके प्राणों से भी बढ़कर था। हमारे इस गौरवपूर्ण इतिहास को कोई मूर्ख अपने क्षूद्र स्वार्थों के लिए कल्पना कहे तो किसे बर्दाश्त होगा? आज इतिहास को कल्पना की तरह दिखाने वाले भी प्रयोग कर सकते हैं लेकिन मूल तथ्यों के साथ छेड़ छाड़ कोई नहीं कर सकता। यदि किसी रचना में खिलजी को हीरो दिखाया जाएगा तो ये नाकाबिल ए बर्दाश्त ही होगा। ऐसा है या नहीं ये कहना तो मुश्किल है लेकिन फिल्म में लीड हीरो के तौर पर लिया गया किरदार यदि रावल रतन सिंह न होकर खिलजी है तो ये इतिहास से खिलवाड़ ही है। ऐसे किसी भी प्रयास का विरोध होना ही चाहिए क्यूंकि ये मुगल कालीन घटिया इतिहासकारों की परंपरा को आगे बढ़ाने का ही एक प्रयास है। यहां भी फिल्म को हिट कराने जैसे क्षूद्र मंतव्य के अलावा और कोई कलात्मक पहलु दिखाई नहीं पड़ता।


शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

दाढ़ी बढ़ाना कट्टरपंथ नहीं लेकिन दाढ़ी के पीछे की जेहनियत कट्टरपंथ हो सकती है

जुनैद जमशेद पर लिखी गई मेरी एक टिप्पणी पर कई मुस्लिम भाइयों के कमेंट आए। इन सभी का कहना था कि संगीत छोड़ कर कोई खुदा की इबादत करे तो उसे कट्टरपंथी क्यूं कहा जाए? सचमुच जुनैद की कोई गलती नहीं थी असली गुनहगार तो वो हैं जो मजहब को गलत तरीके से पेश कर युवाओं का दिमाग खराब कर देते हैं। मेरी टिप्पणी पर जो मुस्लिम भाई कुछ नाराज दिखाई पड़े उनके सवालों के भी मैंने जवाब दिए। वो जुनैद को सिर्फ दाढ़ी तक सीमित मानकर चल रहे थे। ऐसे में जुनैद जमशेद की कहानी को इन सवालों और उनके जवाबों में समझना बहुत जरूरी है। ये इसीलिए जरूरी है ताकि कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली बनकर कोई और जुनैद संगीत को हराम कहकर उन्मादी बातें न करने लगे। दाढ़ी तो हर धर्म का हिस्सा ऐसे में किसी के सिर्फ दाढ़ी भर रख लेने से कोई कट्टर नहीं हो जाता है। असली आफत है उस दाढ़ी को बढ़ाने के पीछे छिपी सोच। पहले मेरी फेसबुक पर की गई टिप्पणी को जस का तस लिख रहा हूं। दरअसल पाकिस्तान में हुए प्लेन क्रेश के बाद जुनैद के बारे में जाना और फिर दिलचस्पी बढ़ गई। उसकी जिंदगी ठीक वैसी थी जैसी पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए में एक सिंगर की दिखाई गई थी, जो अपना संगीत छोड़कर एक तालीबान आतंकी बन जाता है। बांग्लादेश में हाल में हुए आतंकी हमले के एक आतंकवादी की भी ऐसी ही कहानी थी। 
जुनैद जमशेद
मेरी टिप्पणी कुछ यूं थी...
पाकिस्तान के प्लेन क्रैश में मारे गए 47 लोगों में एक जुनैद जमशेद थे... अच्छा खासा सिंगर कट्टर पंथी हो गया था... अभी पढ़ा उसके बारे में तो जाना कि जिस जमाने में लोग पॉप समझ रहे थे वो स्टार बन गया था.. कट्टरपंथी सोच कैसे अच्छे खासे लोगों को खतरनाक बना देती है कि कहानी था जुनैद.. भारतीय श्रोताओं के लिए एक मजेदार चीज भी जानने को मिली... जुनैद ने अपने बैंड VitalSigns के जरिए एक गाना सांवली सलोनी सी महबूबा गाया था.. भारतीय श्रोताओं ने इसे.. 1994 की फिल्म हम सब चोर हैं.. में सुना.. इस गाने को भी चुरा के .. सांवली सलोनी तेरी झील सी आंखे .. बना दिया गया था.. जुनैद कलाकार था और हम कला प्रेमी है .. 

जुनैद और अन्य 46 लोगों को श्रद्धांजलि के साथ 1991 का उसका ये गाना मैंने अपनी फेसबुक वॉल पर पोस्ट किया था। इस पर कई मुस्लिम भाइयों की टिप्पणी आई कि सिर्फ दाढ़ी की वजह से जुनैद को कट्टर नहीं कहना चाहिए। और भी कई टिप्णियां आईं जिनमें मेरे एक भाई अफी कुरैशी ने लिखा- डॉ. साब आपने जो रिसर्च की उसे जानकर अच्छा लगा लेकिन आपको एक जानकारी दे दूं। भगवान, अल्लाह, गॉड, वाहेगुरु के लिए गलत बंदों को नेक राह पर लाना, अमन कायम करना, झगड़ों से, शराब से, जुआ से, चोरी से, डकैती से हर उस गलत काम से रोकना जिसे समाज में बुरा समझा जाता हो, उसे कट्टरपंथी नहीं कहते भाई.. उसे सदक ए जरिया कहते हैं। प्लीज रिसर्च सही करो और कट्टरपंथी और भलाई में फर्क ढूंढों...

इस बात में मुझे कुछ भी गलत नहीं लगा और आमतौर पर मैं रिसर्च पूरी करके ही लिखता हूं। इस मामले में भी मैंने काफी पढ़ा था लेकिन ज्यादा लिखने का मन नहीं किया। मैंने जवाब में लिखा भी कि मैं एक मृतात्मा और वो भी अच्छे कलाकार के बारे में कोई गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ना चाहता। सच तो ये था कि जितने लोग मुझ से इस मसले पर बहस कर रहे थे वो खुद ही जुनैद की कहानी नहीं जानते थे। मैंने ऐसी कई खबरों के लिंक पेस्ट किए जहां जुनैद के खिलाफ पाकिस्तान में ही मामला दर्ज किया गया था लेकिन जुनैद के बारे में उनके एक पुराने जानकार और साथी की टिप्पणी सबसे अहम है। दरअसल इसमें अच्छे खासे युवाओं के ब्रेन वॉश का दर्द छिपा हुआ है। ये टिप्पणी पाकिस्तान के मशहूर फिल्मकार और संगीतकार शोएब मंसूर की थी। हिंदी में ये टिप्पणी कुछ इस तरह होगी...

“शोएब मंसूर, 2007- आम सुबह की तरह मैं अखबार पढ़ रहा था इसमें मैंने अपने दोस्त जुनैद जमशेद का इंटरव्यू देखा। उसकी वेशभूषा और तस्वीर देखने के बाद मैं इस इंटरव्यू को पढ़ने से खुद को नहीं रोक पाया। जैसे जैसे मैं पढ़ता गया वैसे वैसे और दुखी होता गया। उसने कहा था कि वो म्यूजिक इसीलिए छोड़ चुका है क्यूंकि ये हराम है। मैं भौंचक्का रह गया। कोई ये कैसे विश्वास कर सकता है कि खुदा की इंसानों को दी गईं दो बड़ी नैमतें.. संगीत और पेंटिंग कभी भी हराम हो सकती हैं। मुझे अहसास हुआ कि जुनैद जैसे भटके हुए लोगों को कोई हक नहीं है कि वो ऐसे ही भटके हुए हजारों युवाओं को दिशा दिखाने का काम करें। मैंने उसे अपने जीवन के अहम 16 साल उसे दिए थे। मुझे आश्चर्य था कि वो ऐसे कैसे इन 16 सालों के साथ को एक तरफ फेंक सकता है वो भी मुझसे बिना सलाह मशविरा किए? मुझे लगा कि ये मेरी जिम्मेदारी है कि समाज को ऐसे कट्टरपंथियों के जरिए हो रहे नुकसान से बचाया जाए।”

शोएब की कही हुई बातें कई जागरूक मुस्लिम विचारक कहते रहे हैं इसके बावजूद वो समाज में आने वाले इस खतरनाक बदलाव को नहीं रोक पाते हैं। जुनैद के प्रति उसे न जानने वालों की अंधभक्ति ये बताती है कि ये बात इस्लाम की नहीं है बल्कि इस्लाम के नाम पर भटके हुए युवाओं में और भटकाव पैदा करने की है। मेरे मुस्लिम मित्र ने फिर पूछा कि मैंने भी दाढ़ी रख ली है तो क्या मुझे भी कट्टरपंथी कहेंगे। मेरा जवाब था बिलकुल नहीं इस मुद्दे का दाढ़ी से कोई लेना देना है ही नहीं। असली वजह है जेहनियत। हमें जेहनियत पर बहस करनी चाहिए दाढ़ी या चोगे पर नहीं। ये बात सिर्फ जुनैद जमशेद की नहीं है ये बात हर उस युवा की है जो मजहब के नाम पर भटकाव की राह पकड़ रहा है। कट्टरपंथियों का मकसद ही होता है ऐसे लोगों को भ्रमित करना जिन्हें दूसरे युवा अपना रोल मॉडल मानते हैं। फिर इनके प्रभाव में आकर कई और युवा भी दाढ़ी बढ़ा लेते हैं। पाकिस्तान के कई क्रिकेटर्स आपको इसी रूप में मिलेंगे। इंजमाम वर्ल्ड कप के दौरान एक सीरिज में कई दिनों तक मेरे साथ एक्सपर्ट के रूप में बैठे। मेरी उनसे अच्छी मित्रता हो गई थी लेकिन मुझे एहसास हुआ कि कई मुद्दों पर उनका एक जकड़ा हुआ रूप भी है। यही वजह है कि वो अपने लोगों के लिए या अपने देश के उन युवाओं के लिए जो उन्हें अपना रोल मॉडल मानते हैं के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं। युवा जाकिर नाइक जैसे भड़काऊ भाषण देने वालों पर ज्यादा भरोसा करते हैं जबकि इस्लाम के कई जानकार खुद ही ऐसे लोगों को खतरनाक करार देते रहे हैं। जब जुनैद की कहानी लिख रहा था तो नुसरत साहब की कव्वालियां भी सुन रहा था। आम तौर पर लिखते हुए उन्हें सुनना बहुत सुकून देता है। उन्हें सुनते हुए ये ख्याल भी आ रहा था कि किसी जेहनियत के चक्कर में फंसकर वो भी दाढ़ी बड़ा लेते तो ये खूबसूरत यादें कभी न मिल पातीं।







शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

यूपी में ब्राह्मण के शंखनाद और राम नाम की गूंज


पहले कांग्रेस ने अपनी छबि के विपरीत जाते हुए यूपी में ब्राह्मण कार्ड खेला। शीला दीक्षित और राज बब्बर को यूपी में चेहरा बनाकर उतार दिया। अब समाजवादी पार्टी ने भी अपनी छबि से विपरीत काम करते हुए राम की शरण ले ली। मुल्ला मुलायम के नाम से मशहूर नेता जी को भी अब राम नाम जपने की जरूरत महसूस हो रही है। कांग्रेस के लिए रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने अपने आंकलन से बताया कि इस दफा चुनाव में ब्राह्मण मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। समाजवादी पार्टी के राजनैतिक पंडितों को बीजेपी की हवा के बीच हिंदू मतदाताओं को रिझाने की चिंता सता रही है। वहीं बीजेपी ने भी जय श्रीराम के नारे को बुलंद कर ये अहसास करा दिया कि राम का नाम उसके लिए भी उत्तर प्रदेश चुनाव की नैया पार लगाने वाला है। राहुल गांधी की नहा धोकर हनुमान जी की पूजा पाठ वाली तस्वीरें भी आप नहीं भूले होंगे। एक बात तो साफ है कि सभी राजनैतिक दलों की नजर इस बार हिंदू वोटों पर लगी हुई है। खास तौर पर ब्राह्मण वोटों को अपनी तरफ करने का प्रयास सभी दलों की तरफ से किया जा रहा है। इसकी अहम वजह है 2014 लोकसभा चुनाव के नतीजे। इस चुनाव में ये वोट बैंक बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत बना। यदि मोदी और बीजेपी का वही असर यूपी पर देखने को मिला तो विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी को एक बड़ी जीत हासिल होगी। राम नाम की नैया पर सवार बीजेपी के पीछे पीछे समाजवादी पार्टी जैसे राजनैतिक दल भी अब इस जप के महत्व को समझ रहे हैं।

विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दशहरे पर ‘जय श्री राम’ का नारा बुलन्द करने के साथ ही ‘राम संग्रहालय’ का निर्माण करवाने का निर्णय लेकर अयोध्या को एक बार फिर सुर्खियों में ला खडा किया। इसके साथ ही समाजवादी पार्टी ने भी रामायण सर्किट की सौगात देकर राम भक्तों को रिझाने की कोशिश की है। विपक्ष इसे नरेंद्र मोदी की सोची समझी रणनीति का हिस्सा मान रहा है तो बीजेपी का कहना है कि पार्टी ने मंदिर मुद्दे को कभी भी राजनीति से जोड़कर नहीं देखा। राम मंदिर को अपने मेनिफेस्टो का अहम हिस्सा बताने वाली बीजेपी की राम मंदिर पर ज्यादा जिम्मेदारी है लेकिन अभी तक इस मुद्दे पर बीजेपी निशाने पर ही रही है। मंदिर से शुरू हुए और म्यूजियम तक पहुंचे के आरोप भी बीजेपी पर लगने लगे हैं। विनय कटियार जैसे नेताओं ने भी इस मुद्दे पर अपने तेवर तल्ख कर लिए। 

बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती कहती हैं कि चुनाव के मौके पर बीजेपी और सपा दोनों मिलकर अयोध्या मुद्दे को गरम करना चाहते हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए सपा अध्यक्ष मुलायम यादव को हर चुनाव में ‘बाबरी विध्वंस’ की याद आती है तो दूसरी ओर उनके मुख्यमंत्री पुत्र हिन्दुओं में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए अयोध्या में थीमपार्क बनवाने जा रहे हैं। दूसरी तरफ ब्राह्मणों को अपना चेहरा बनाने वाली कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव के समय ही रामायण संग्रहालय बनवाने की याद क्यों आई। इसके आगे पीछे भी इस योजना पर काम किया जा सकता था। 

बीजेपी ने कहा कि अयोध्या और श्री राम को हमने हमेशा से आस्था का विषय माना है। पार्टी ने इसे राजनीति या चुनाव से जोड़कर कभी नहीं देखा है। बीजेपी का ये भी कहना है कि विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं है इसलिए वो अनावाश्यक रूप से आरोप लगाते रहते हैं।

बयान बाजी की राजनीति तो होती रहेगी लेकिन जाति और धर्म की राजनीति यूपी की राजनीति का एक अहम सच है। इस सच को कोई भी राजनीतिक दल अनदेखा नहीं कर सकता पर अचानक यूपी की पूरी सियासत में ब्राह्मण बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं। 2017 में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के मद्दे नजर क्या सपा क्या कांग्रेस सभी ब्राह्मणों को रिझाने की जुगत में लगे हुए हैं। उत्तर प्रदेश में 10 प्रतिशत ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण उत्तर प्रदेश में किसी भी पार्टी की सियासी नांव किनारे लगाने के लिहाज से एक हैसियत रखते हैं। जिस तरफ ब्राह्मण मुड़ जाते हैं उस पार्टी की नैय्या पार लग जाती है। हांलाकि ये भी एक तथ्य है कि लंबे समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण हाशिए पर आ गए थे। 

इस बार पूरा चुनावी गणित उल्टा हो गया है। ब्राह्मण वोट को बीजेपी बाय डिफॉल्ट अपने साथ मानती है और इसीलिए उसका जोर दलितों को लुभाने पर है। करीब 22 फीसदी दलितों का साथ बीजेपी के पास आ जाए तो सूबे में उसकी सरकार होगी। 2007 में दलितों की मसीहा मायावती ने 86 ब्राह्मणों को टिकट दिया था और इस वोट बैंक की ताकत भी सियासी दलों को दिखाई थी। बेशक वो सपा और बीजेपी पर सवाल खड़े करें लेकिन वो भी राम नाम की सियासत के खिलाफ खुलकर कुछ नहीं बोल पाएंगी। मायावती का ध्यान भी ब्राह्मण वोटों पर लगा है। वहीं अभी तक मुस्लिम, यादव और दूसरे ओबीसी की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मणों को रिझाने में जुटी है। 

पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा ने लगभग 40 ब्राह्मण सम्मेलन किए थे। बसपा पार्टी ने नारा दिया था, ब्राह्मण शंख बजायेगा, हाथी दिल्ली जायेगा, लेकिन मोदी की आंधी में ब्राह्मण के बीजेपी में जाने से बसपा का खाता भी नहीं खुल सका था। 1990 पहले ब्राह्मण को कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता था। 1990 के आंदोलन के दौरान ब्राह्मणों ने बीजेपी का दामन थामा जिससे पार्टी सीधे 221 सीट जीतकर सूबे की सत्ता पर काबिज़ हो गई लेकिन उसके बाद बीजेपी में ब्राह्मणों की अनदेखी होने लगी। एक समय ऐसा भी आया जब ब्राह्मणों की हालत पार्टी में पतली हौ गई। ब्राह्मणों का भी बीजेपी से मोह भंग हुआ और इसका नतीजा रिजल्ट 2007 और 2009 में देखने को मिला। बीजेपी महज 10 लोकसभा सीट और 40 विधानसभा सीटों पर सिमट कर रह गई। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी जीत के जिस शिखर पर दिखाई पड़ती है उसके पीछे उसे मिला ब्राह्मणों का साथ ही है। 

2014 के नतीजों ने सभी राजनैतिक दलों को ब्राह्मण मतदाताओं को रिझाऩे की जरूरत महसूस करवाई है। इसके साथ ही अभी तक मुस्लिम मतदाताओं के पीछे भागने वाले राजनैतिक दलों को हिंदू मतदाताओं की याद आ रही है। हिंदू मतदाता जातियों में बंटा हुआ है और यही वजह है कि उस सवर्ण दलित, पिछड़े, अति पिछड़े जैसे अलग-अलग भाग देखने को मिलते हैं। जब राम नाम की बात आती है तो आस्था जाति से ऊपर उठकर होती है। सवर्णों के साथ के अलावा राम का नाम इन हिंदू मतदाताओं को भी अपनी तरफ आकर्षित करने का एक जरिया है। मुस्लिम मतदाता बीजेपी की तरफ न के बराबर जाएगा ऐसे में तमाम दूसरे राजनैतिक दल बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। एमआईएम जैसे दलों की घुसपैठ हो या फिर सपा और कांग्रेस के बीच चुनाव का कन्फ्यूजन, करीब 18 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं का बंटना तय है। लोकसभा चुनाव में उनका पूरा का पूरा वोट बीजेपी के खिलाफ रहा लेकिन इसके बावजूद बीजेपी को बड़ी कामयाबी मिली। बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने की ये कोशिश कितनी कामयाब होगी ये कहना तो मुश्किल है लेकिन ये तय है कि चाहे कांग्रेस हो या समाजवादी पार्टी वो चुनाव से पहले ही अपनी रणनीति के जरिए बीजेपी को चुनाव जीता हुआ दिखा रही है।



सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

मुहर्रम के बाद भी मातम क्यों ?


मुहर्रम तो मातम का दिन है ही लेकिन इसके बीत जाने के बाद भी कई घरों में मातम पसरा हुआ है। ये घर उन परिवारों के जिनके अपनों को दुर्गा विसर्जन के दौरान बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। अब हिंदू संगठनों का आरोप है कि ममता के राज में 'सोनार बांग्ला बर्बाद बांग्ला 'बन गया है| वैसे मुहर्रम पर इस तरह की हिंसा और उसमें हिंदुओं का मारा जाना कोई नई बात नहीं है वामपंथियों के राज में भी हिन्दुओं की दुर्दशा ही होती थी, लेकिन अब हिंसा के शिकार लोग और उनके परिजन ये तक कहने से नहीं चूक रहे हैं कि ममता ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए वो सब अत्याचार किये है जो कभी मुस्लिम अक्रान्ताओ के राज में भी नहीं किये गए थे|
इस साल दुर्गा पूजा पर ऐसे प्रतिबन्ध लगाये गए जो पहले कभी नहीं लगाए गए थे| मा. उच्च न्यायलय के हस्तक्षेप के बाद हिन्दू समाज ने चैन की साँस ली, लेकिन मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के द्वारा भड़काए गए लोगों ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रो में हिंसा का अभूतपूर्व तांडव किया| विश्व हिन्दू परिषद ने तो यहां तक दावा किया है कि कई जगहों पर मां दुर्गा  के पूजा पंडालो में गौमांस फेका गया और प्रतिमाओं को खंडित किया गया। हांलाकि इससे जुड़ी खबरें मीडिया में वैसे भी नहीं आती हैं। ये एक संवेदन शील मुद्दा माना जाता है लेकिन इस संवेदनशीलता की आड़ में हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
लोग कई तस्वीरें और वीडियो तो साझा कर रहे हैं लेकिन सही तस्वीर तक सामने नहीं आने दी जा रही है। अगर सचमुच यही स्थिति बनी हुई है तो ये भी तय है कि कोर्ट की फटकार सुनने वाली सरकार और उसका प्रशासन ऐसी खबरों को बाहर आने ही नहीं दे रहा होगा। हिन्दू मंदिरों को तोडे जाने की घटनाओं का दावा भी विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारी कर रहे हैं। ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं जहां मकानों और दुकानों पर हमले कर उन्हें लुटा गया। बाद में उन्हें जला दिया गया और हिन्दुओ पर जानलेवा हमले किये गए| बांग्ला देश में हिंदुओं की हालत किसी से छिपी नहीं है। वहां की सरकार ने अपने यहाँ हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने का भरोसा दिलाया लेकिन ये सिर्फ दिखावा ही साबित हुआ है। हद तो ये है कि हमारे अपने देश के एक राज्य पं. बंगाल में भी बांग्लादेश जैसे हालात दिख रहे हैं और राज्य सरकार पर हिंसा करने वालों को संरक्षण देने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। आरोप ये लग रहे हैं कि पुलिस हिंसा करने वालों को रोकने की जगह पीड़ित हिन्दुओं पर ही मामले दर्ज कर रही है|
बंगाल में पहले भी कई जगह हिन्दू समाज दुर्गा पूजा नहीं कर पता था| परन्तु इस बार सब सीमाएं पार हो गयी| बंगाल के कई स्थानों पर हिन्दूओं पर वो अत्याचार हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था| वहां से ठीक ठीक आंकड़े तो नहीं मिल पाए लेकिन विश्व हिंदू परिषद ने औपचारिक रूप से जो आंकड़े सामने रखे उनके मुताबिक मालदा जिले के कालिग्राम, खराबा, रिशिपारा, चांचल; मुर्शिदाबाद के तालतली, घोसपारा, जालंगी, हुगली के उर्दिपारा, चंदननगर, तेलानिपारा, उर्दिबाजार; नार्थ २४ परगना के हाजीनगर, नैहाटी; प. मिदनापुर गोलाबाजार, खरकपुर, पूर्व मिदनापुर के कालाबेरिया, भगवानपुर, बर्दवान के हथखोला, बल्लव्पुर्घाट, कतोआ; हावड़ा के सकरैल, अन्दुलन, आरगोरी, मानिकपुर, वीरभूम के कान्करताला तथा नादिया के हाजीनगर जैसे इलाकों में कई जगहों पर हिन्दुओ पर अमानवीय अत्याचार किये गए| कई इलाके ऐसे भी हैं जहां ११ अक्टूबर से शुरू हुई हिंसा आज भी नहीं रुक पाई है|

तुष्टिकरण की राजनीति ने देश में 'सेक्युलर माफिया' को जन्म दिया है। ममता बनर्जी ने जिस तरह का बर्ताव दुर्गा पूजा के दौरान किया है उससे साफ है कि वो मुस्लिम मतदाताओं की भगवान बनने के लिए हिंदुओं पर होने वाली हिंसा को नजरअंदाज करने से भी गुरेज नहीं कर रही। हमारे देश में ऐसे मुददे पर बात करना या लिखना तक संवेदनशील मानान जाता है लेकिन इस आतंक की आग पीछे असली वजह होती है तुष्टिकरण की आग को भड़काया जाना| ये आग इतनी भयानक है कि इसे भड़काने वाले भी इससे नहीं बच पाएंगे।  ममता बनर्जी नहीं भूली होंगी कि किस तरह कोलकाता के एक मौलवी ने मांगे पूरी न होने पर उन्हें कैसे धमकाया था| अभी कालिग्राम और चांचल में हिंसा को रोकने वाले पुलिस वालोँ और जिलाधीश को किस प्रकार पीटा गया  और पुलिस स्टेशन को लूट लिया गया,  ये भी हिंसा करने वालों को मिली खुली छूट की तरफ इशारा करता है।

ऐसा नहीं है कि तुष्टिकरण की राजनीति से उपजी इस हिंसा का शिकार सिर्फ बंगाल के हिंदू हो रहे हैं। इसी तरह का दृश्य बिहार में भी दिखाई दे रहा है| चंपारण के  पुरकालिया, रक्सौल, सुगौली, किशनगंज, मधेपूरा, गोपालगंज, पिरो [आरा ], मिल्की, भागलपुर गाँव, औरंगाबाद के वरुण, खोगीय व पटना के बस्तियारपुर जैसे बीसियों गावों में इसी प्रकार के अत्याचार हो रहे है। मोतिहारी-चम्पारण के इलाके में दुर्गा विसर्जन के दौरान निकले उत्सव के दौरान गोलीबारी की जानकारी मुझे खुद एक स्थानीय पत्रकार ने दी। ये खबरें मीडिया में इसीलिए नहीं दिखाई जा रही क्यूंकि इन्हें संवेदनशील कहकर दबा दिया जाता है। एडवाइजरी जारी कर दी जाती है। उस वक्त प्रशासन मुस्तैद क्यूं नहीं होता जब दुर्गा माता की पूजा बाधित की जाती है?| नितीश का 'सुशासन ' आज माता के भक्तों के लिए दुशासन बन गया है| आज भी बिहार में कई स्थानों पर मजहब के नाम पर लगाई गई ये आग ठंडी नहीं हुई है| हिंसा करने वालों पर कार्यवाही करने में अक्षम नितीश सरकार पर पीड़ित हिन्दुओ पर ही झूठे मामले दर्ज कर खानापूर्ति करने के आरोप भी लग रहे हैं| 

बात यहां तक बिगड़ चुकी है कि अब हिंदू वादी संगठन ये कह रहे हैं कि यदि कथित सेक्युलर सरकारें अपने संवैधानिक कर्तव्यो को पूरा नहीं करेगी तो हिन्दू को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए स्वयम खड़ा होना पड़ेगा | कर्नाटक में एक हिन्दू कार्यकर्ता की दिन दहाड़े हत्या ने भी देश को स्तब्ध कर साबित करने की कोशिश की है कि मजहबी सियासत को किस तरह से एक बार फिर हवा दी जा रही है।