बुधवार, 10 अगस्त 2016

क्या है नीतीश कुमार की शराबबंदी का सच? क्यूं डर रही है शराबबंदी से बिहार की महिलाएं?

नीतीश कुमार शराब बंदी पर अपने विरोधियों के खिलाफ खुलकर सामने आए हैं। उन्होंने एक ब्लॉग के जरिए कहा है कि ये एक बड़ी चुनौती है लेकिन वो इससे पीछे नहीं हटेंगे। दूसरी तरफ उनके गृह जिले नालंदा में शराब बनाने वाले लोगों पर हुए सामुहिक जुर्माने ने शराबबंदी से बेरोजगार हुए लोगों की एक नई कहानी सामने रख दी है। 10 पुलिस अधिकारियों के सस्पेंड कर भी उन्होंने शराबबंदी को लेकर अपनी सख्ती दिखाने की कोशिश की है। इन तमाम उठापटक के बीच अब ये सवाल गहरा रहा है कि नीतीश कुमार की शराबबंदी को लेकर आखिर क्या सोच है? क्या सचमुच बिहार को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने शराबबंदी की इस मुहिम को शुरू किया है या फिर इस पीछे भी कोई सियासी गणित हैं?
निजी तौर पर मैंने पहले भी नीतीश कुमार की इस पहल को एक बेहतरीन कदम बताया है। शराब इस देश को खोखला कर रही है और शराबबंदी के जरिए देश में अपराध और युवाओं के भटकाव की समस्या से बहुत हद तक निपटा जा सकता है। बिहार में शराब बंदी के बाद से ही नीतीश कुमार शराब माफिया और विरोधियों के निशाने पर रहे हैं। बिहार में शराबबंदी के बाद से एक छटपटाहट देखने को मिली है। इसी का नतीजा है कि उनके अपने गृह जिलें नालंदा से लगातार अवैध शराब मिलना उनके लिए चुनौती बना हुआ है। इस सबके बीच नीतीश कुमार ने एक ब्लॉग के जरिए शराबबंदी की पुरजोर वकालत करते हुए गांधी जी को कोट किया।

उन्होंने लिखा है कि महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में 1931 में लिखा था - यदि मुझे एक दिन के लिए भारत का तानाशाह बना दिया जाए तो मैं सबसे पहले पूरे देश में बिना कोई मुआवजा दिए सभी शराब की दुकानों के बंद करवा दूंगा। साथ ही उन्होंने गांधी जी की इस बात को भी पुरजोर तरीके से लिखा कि किसी भी देश की जड़ों को खोखला करने के लिए नशा ही जिम्मेदार होता है। बड़ी बड़ी सियासतों का अंत इसी शराब की वजह से हुआ है। नीतीश ने जितनी भी बातें लिखी हैं उनसे शायद ही कोई इन्कार कर पाए।

इसमें सियासत की बू तब सामने आती है जब वो इसी ब्लॉग में गुजरात का नाम लिए बगैर कहते हैं कि जिन राज्यों में शराब बंदी लागू भी की गई है वहां ये पूरी तरह से कामयाब नहीं है। ये बात सच भी है कि जिन राज्यों में शराबबंदी होती है वहां शराब उपलब्ध हो जाती है। गुजरात भी इससे अछूता नहीं है। ये जरूर है कि जिन राज्यों में शराबबंदी होती है वहां अपेक्षाकृत इसके दुष्प्रभाव कुछ कम हो जाते हैं। हांलाकि शराब के दुष्प्रभाव सामने आते हैं तो शराबबंदी के भी कुछ दुष्प्रभाव हमारे सामने आए हैं।

एक तरफ नीतीश कुमार शराब बंदी का दावा कर रहे दूसरी तरफ उनके गृह जिले नालंदा के इसलामपुर एक गांव के दलित परिवार उनकी सरकार पर बरसते दिखाई दे रहे हैं। दरअसल शराबबंदी के बावजूद यहां से बङे पैमाने पर देशी-विदेशी शराब मिलने का सिलसिला जारी है। इसी वजह से प्रशासन ने हर परिवार पर पांच पांच हजार रुपय का जुर्माना लगा दिया है। इन लोगों का कहना है कि उनके पास खाने को पैसा नहीं है तो वो जुर्माना कहां से भर पाएंगे? प्रशासन इस मामले को लेकर कितना सख्त है इसकी बानगी 10 एसएचओ को सस्पेंड करने की कार्रवाई से लगाया जा सकता है।
गांव वालो का आरोप है कि राज्य सरकार ने इन लोगों को बेरोजगार कर दिया है। बेरोजगारी के कारण ही ये लोग शराब बनाने के धंधे में आए थे। इनका कहना है ये जुर्माना कहा से भरेंगे जब पेट भरने के लिए भी पैसा नहीं है। सबसे अहम बात उन महिलाओं की है जो शराबबंदी के फैसले से बहुत खुश थीं लेकिन उनका अब कहना है कि वो शराब बंदी तो चाहती हैं लेकिन उनके पतियों के जेल जाने की कीमत पर नहीं। शराबबंदी करना और शराब का छूट जाना में बहुत फर्क होता है। शराब लाखों लोगों का कारोबार है तो करोड़ों लोगों की लत है। लत और रोजगार दोनों ही चुनौतियों को सामने रखकर कोई फैसला लेना ही कारगर हो सकता है। यही वजह है कि सुशासन बाबू को ये लोग तानाशाह कहने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं।

उन्होंने अपने ब्लॉग के जरिए इन आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि सरकार को मिली शक्ति समाज की भलाई के लिए ही होती हैं। नशे का कारोबार किसी अधिकार के दायरे में नहीं आते हैं। ये आरोप बेबुनियाद है कि ये तानाशाही रवैया है क्यूंकि सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा है कि नशे बेचना, खरीदना, आयात करना, निर्याता करना या भंडारण करना किसी मौलिक अधिकार का हिस्सा नहीं है। समाज के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी सरकार की है और मैं ये जिम्मेदारी निभाता रहुंगा।

इन आरोपों के बीच सुशासन बाबू पर शराबबंदी को लेकर एक राजनैतिक आरोप भी लगा ये आरोप उनकी सियासी दोस्त कही जाने वाली आम आदमी पार्टी के ही एक सदस्य ने लगाए। अपने एक ब्लॉग में इन्होंने लिखा कि शराबबंदी के बाद जब मैं बिहार गया तो लोगों में इसको लेकर सकारात्मकता तो दिखी लेकिन साथ ही साथ एक डर का माहौल भी देखने को मिला। खासतौर पर महिलाएं जबरदस्ती शराबबंदी होने के बाद लगातार हो रही पुलिसिया कार्रवाई से बहुत खौफजदा हैं। उन्होंने ये भी लिखा कि नए कानून के मुताबिक सिर्फ शराब रखने वाला शख्स ही नहीं उसके परिवार के 18 वर्ष से ज्यादा उम्र के सभी लोगों को जेल भेजने का प्रावधान है।

शराब बंदी के बाद राज्य सरकार को आबकारी आय में जबरदस्त घाटा उठाना पड़ रहा है। सुशासन बाबू को अपनी छबि मजबूत करने में तो इससे फायदा मिल रहा है लेकिन आर्थिक तौर पर सरकार को इस मोर्चे पर झटका लग रहा है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर वो ये काम कर ही क्यूं रहे हैं। इसी ब्लॉग में एक स्थानीय पत्रकार के हवाले से ये भी लिखा है कि अवैध शराब का कारोबार पार्टी फंड में ज्यादा पैसा लेकर आता है। नीतीश अगले लोकसभा चुनाव में खुद को मोदी की टक्कर में खड़ा मान रहे हैं, यही वजह है कि वो अगले चुनाव के लिए पैसा जुटाने में लगे हुए हैं।

ये तर्क कमजोर दिखाई पड़ सकता है लेकिन नीतीश कुमार की महत्वकांक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नीतीश कुमार ने बिहार लोकसभा चुनाव में अपनी हार को मोदी के खिलाफ हुई हार माना और लालू जैसे धुर विरोधी से हाथ मिलाने में भी गुरेज नहीं किया। केंद्र की राजनीति में मोदी के खिलाफ कोई और चेहरा विपक्ष की तरफ से नहीं दिखाई पड़ता है। मुलायम, ममता, जयललिता और नीतीश कुमार जैसे चेहरे स्थानीय राजनीति में बड़े हो सकते हैं लेकिन जब केंद्र की राजनीति की बात आती है तो ये चेहरे मोदी के कद के दिखाई नहीं पड़ते।


इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि दो साल पहले मोदी भी क्षेत्रीय राजनीति का ही चेहरा थे। गुजरात में रहते हुए उन्होंने खुद को राष्ट्रीय पटल पर एक बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करने में कामयाबी हासिल की थी। नीतीश कुमार मोदी की ही राह पर चल रहे हैं। मोदी मंत्र को अपनाते हुए पहले उन्होंने अपने प्रचार को बिलकुल उन्हीं के अंदाज में सामने रखा। उन्हें किसी समय में मोदी की ही टीम का हिस्सा रहे प्रशांत किशोर का साथ भी मिला। गौर करने वाली बात ये है कि प्रशांत औपचारिक तौर पर बिहार सरकार के सलाहकार भी हैं। नीतीश के शराबबंदी के फैसले को भी बहुत दूरदर्शिता के साथ लिए गए फैसले के बजाए चुपचाप मोदी मंत्र को मान लेने के तौर पर भी देखा जा सकता है। यही वजह है कि बेशक गांधी के बहाने ही सही नीतीश कुमार को तानाशाह कहलाने में भी कोई हर्ज नहीं है।

शनिवार, 6 अगस्त 2016

क्यूं बिंदी, सिंदूर और मंगलसूत्र नहीं पहन सकती मुस्लिम महिलाएं?

क्यूं बिंदी, सिंदूर और मंगलसूत्र नहीं पहन सकती मुस्लिम महिलाएं?

क्या मुस्लिम महिलाएं बिंदी और सिंदूर लगा सकती हैं? ऐसे सवालों के बारे में भी सोचना पड़ता है क्यूंकि इसका विरोध करने वाले भी इस देश में मौजूद हैं। इस विषय पर लिखूं या न लिखूं को लेकर असमंजस बना रहा लेकिन जब दर्जन भर जिम्मेदार लोगों से बातचीत हो गई तो लगा विषय महत्वपूर्ण है जरूर कुछ लिखा जाना चाहिए। डॉ. फहीम बेग, अंसार रजा जैसे इस्लामिक विद्वान साथ में थे तो रजा मुराद, नगमा जैसे फिल्मों में काम करने वाले इस्लाम के मानने वाले कलाकार भी मौजूद थे। इस मामले पर सना खुद जुड़ीं और फिर उनके पति एजाज से भी इस पर बातचीत हुई। इतने लोगों से बात करने के बाद एहसास हुआ कि बिंदी और सिंदूर का ये मुद्दा इतना छोटा नहीं है जितना दिखाई पड़ता है।
फिल्म अस्तित्व की एक सांकेतिक तस्वीर

सना ने कई कट्टरपंथियों के हमलों का जवाब देते हुए कहा मेरी मां और नानी तो मंगलसूत्र पहनती हैं और सिंदूर लगाने से मेरा इस्लाम कम नहीं हो जाता। दूसरा हमारे देश में हर किसी को अपने तरीके से पहनने, ओढ़ने और रहने की आजादी है। मुझे नहीं लगता कि सिंदूर लगाने से खुदा मुझे दोज़ख में पहुंचा देंगे। सना ने जो बातें मुझ से बातचीत में कहीं वो उन्होंने फेस बुक पर भी लिखीं थी। उनकी इन बातों में एक जकड़न का भी एहसास होता है कि क्या इस्लाम को मानने की वजह से उनकी मंगलसूत्र पहनने या सिंदूर लगाने की अर्हता खत्म हो जाती है?

मैं इस्लाम का जानकार नहीं हूं जाहिर तौर पर इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता हूं। इस पर टिप्पणी करने के लिए दो विद्वान जुड़े। डॉ. फहीम बेग और अंसार रजा। विद्वानों की विद्वता ही आम लोगों का असमंजस बढ़ा देती है। ये दोनों भी ऑन एअर ही लड़ पड़े। फहीम बेग तो ये तक कह गए कि टीवी सीरियल में काम करने वाला किसी मजहब का रह ही कहा जाता है। उन्होंने ये भी कहा कि ऐसे सीरियलों में अंग प्रदर्शन किया जाता है।

अंसार रजा ने कहा आप भी टीवी पर हैं बेग साहब तो आप भी इस्लाम से बेदखल हो गए। उन्होंने ये भी कहा कि बिहार के कई गांवों में इस्लाम मानने वाली महिलाएं बिंदी लगाती हैं या मंगलसूत्र पहनती हैं इससे उनका इस्लाम कम नहीं हो जाता। जन्नत या दोजख भेजने का काम बेग साहब जैसे लोगों का नहीं है जो इस्लाम को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं। जो फेस बुक और ट्वीटर पर इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं वो भी अधकचरे जानकार है और ऐसे लोग इस्लाम को बदनाम ज्यादा करते हैं।

सना ने भी कहा कि ऐसे लोग जो दिन भर ट्वीटर और फेसबुक पर नसीहतें दे रहे हैं क्या उनका इस्लाम खत्म नहीं होता? मनोरंजन के ये सारे साधन भी इस्लाम में हराम हैं ऐसे में क्या इन पर भी सवाल खड़े नहीं होने चाहिए? सिर्फ बिंदी, सिंदूर या महिलाओं से जुड़ी बातों को उठाकर कट्टरपंथी इस्लाम को गलत तरीके से पेश करते हैं।

इन सब मेहमानों में मुझे दो लोगों की बातों ने सोचने पर मजबूर किया। ये दो लोग थे जानी मानी अभिनेत्री और कांग्रेस प्रवक्त नगमा और सना के पति एजाज खान। नगमा एक महिला हैं और मुसलमान भी हैं। वो फिल्मों को भी नजदीक से जानती है। उन्होंने एक भी बार सीरियल के बाहर बिंदी लगाने या मंगलसूत्र पहनने का समर्थन नहीं किया। वो परदे पर मेकअप करने के दौरान या किरदार की मजबूरियों के चलते इनके इस्तेमाल को तो जायज ठहराती रही लेकिन मुस्लिम महिलाओं को आम जिंदगी में इनका इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं पर वो कुछ भी कहने से बचती रहीं।

सना के पति एजाज खान ने एक बढ़िया बात कही। मेरी मां और नानी भी मंगलसूत्र पहनते हैं। मुझे नहीं पता इस्लाम के जानकार इस पर क्या कहते हैं। मैंने अपने धर्म को जितना जाना और समझा है अपनी मां से ही समझा है। अगर वो ऐसा करती हैं तो फिर मेरे इसके विरोध करने का सवाल नहीं उठता। जहां तक औरों की धार्मिक आस्था का सवाल है मैं चाहता हूं इस मामले को ज्यादा न खींचा जाए।

नगमा और एजाज से हुई बातों से एहसास हुआ कि खुले विचारों के होने के बावजूद वो कुछ बंदिशे महसूस करते हैं। वो खुलकर बोलने से परहेज करते हैं क्यूंकि उन्हें कट्टरपंथियों के विरोध का डर है। अब सवाल ये उठता है कि जब इस लोकतांत्रिक देश में सबको समान अधिकार प्राप्त है तो किसी के पहनने ओढ़ने पर प्रश्न चिन्ह लगाकर आखिर धर्म का कौनसा सम्मान ये लोग कर रहे हैं? क्या फिल्मों में काम करने वाले शाहरुख, सलमान जैसे कलाकार अब मुसलमान नहीं रहे? क्या परदे पर बजरंग बली के परम भक्त बने बजरंगी भाईजान के खिलाफ इन कट्टर पंथियों को आवाज नहीं उठानी चाहिए थी। दरअसल ये बात इस्लाम की नहीं ये बात महिला सम्मान की है। वहीं महिलाओं के लिए पाबंदियों से भरे इस समाज में इस सोच को जिंदा रखने कि है कि महिलाओं ने सामाजिक और धार्मिक दायरों में रहने का ठेका ले रखा है।


शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

गांधी को बदनाम करते उनके ‘अपने’!


महात्मा गांधी को किसने मारा? दक्षिणपंथ और उनकी हत्या का क्या कनेक्शन है? गांधी को लेकर भी क्या कोई बहस हो सकती है? गांधी ये, गांधी वो, गांधी राजनीति, गांधी पार्टी और जाने क्या क्या रोज सोशल साइट्स पर घूमता रहता है। गांधी देश की राजनीति के लिए बहुत जरूरी हैं और गांधी आजादी के पहले भी दुनिया की राजनीति के लिए अहम थे। जो अहमियत रखता है कार्टून्स उसी पर बनते हैं। आजादी के पहले गांधी पर बहुत कार्टून बनते रहे। अपने कार्टून पर किए शोध के दौरान मैंने आजादी के पहले के ऐसे कई कार्टून्स को शामिल किया था। गांधी पर कार्टून सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के हर देश में बने। वो सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति में एक रुतबा रखते थे। गांधी के आज देखे एक कार्टून ने मुझे आज कुछ लिखने पर मजबूर कर दिया।

मुझे अपनी पीएचडी के फाइनल प्रेजेंटेशन की एक घटना याद आ गई। इस मौके पर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के हॉल में शहर के कई गणमान्य लोग और पत्रकार मौजूद थे। मेरे गाइड और उस वक्त पत्रकारिता विभाग के प्रमुख डॉ. मानसिंह परमार भी इस प्रेजेंटेशन को लेकर काफी उत्साहित थे। कुलपति औऱ शहर भर के वरिष्ठ पत्रकारों की मौजूदगी में इस तरह से औपचारिक प्रेजेंटेशन कम होते है और यही वजह थी कि हमारा पूरा विभाग इस मौके पर खासा उत्साहित था।


मुझ पर जिम्मेदारी ज्यादा थी क्यूंकि आखिरकार मैंने क्या शोध किया है और वो पत्रकारिता विभाग के लिए किस काम का है, जैसे कई मुद्दों को भी मुझे यहां साबित करना था। काफी लोगों ने इसकी सराहना की लेकिन एक मौका ऐसा भी आया पूरा हॉल सन्न रह गया। यहां शहर ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातनाम एक पत्रकार ने खड़े होकर अपनी गरजती आवाज में कहा डॉक्टर बनना तो दूर तुम्हें जेल हो जाएगी प्रवीण। मैं उनकी इस बात से सकपका गया।
दरअसल इस शोध में मैंने देश और दुनिया के उन कार्टून्स को भी शामिल किया था जिन पर विवाद हुए थे। ऐसे ही एक कार्टून को शोध के साथ मैंने शामिल किया था। इस पर काफी चर्चा हुई। मैंने तर्क रखा की सार्वजनिक तौर पर मैं इस कार्टून को नहीं रखने जा रहा ऐसे में इसे यहां रखने और इसके सार्वजनिक प्रकाशन में फर्क हैं। वहां से तर्क आया ये थिसिस युनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में रहेगी कई और शोधार्थियों के लिए रेफरेंस का काम करेगी ऐसे में ये नहीं कहा जा सकता कि इसके थिसिस में प्रकाशन और किताब और अखबारों के प्रकाशन में कोई फर्क है।

अंततः वहीं भरे सभागार में शोध से उन दो पन्नों को मैंने फाड़ कर इस विवाद को शांत किया। सवाल तब भी मन में आया था कि इंटरनेट पर ये सारी चीजें मौजूद हैं फिर क्या फर्क पड़ता है इन्हें छापने से? खैर शोध के दौरान ये भी समझ गया था कि इनके प्रकाशकों की क्या हालत होती है। ये घटना मुझे एक ऐसे कार्टून को फेसबुक पर तैरते हुए देखकर याद आई जिसमें गांधी जी के दस सिर दिखाए गए हैं। कथित तौर पर इसे नाथूराम गोडसे की मैग्जीन के लिए प्रकाशित किया गया था। मुझे नहीं लगता कि ये कार्टून बैन हुआ था। इसके बावजूद इस कार्टून के जरिए नाथूराम गोडसे या किसी अन्य किसी की बदनामी से ज्यादा गांधी का अपमान होता दिखता है। इस कार्टून का इस्तेमाल वो लोग ज्यादा करेंगे जो गांधी के बारे में कई बातें लिखते रहते हैं।

हैरानी की बात ये है कि ये कार्टून गांधी जी के प्रपोत्र तुषार गांधी ने पोस्ट किया था। यदि वो नाथुराम गोडसे को गलत व्यक्ति मानते हैं तो उनके ऐसे कार्टून्स को संभाल कर रखने का मतलब समझ से परे है। मेरे जैसे कार्टून के शोधार्थी ने भी जो विवादास्पद कार्टून नहीं देखा था उसे पूरी दुनिया को दिखाने का काम गांधी के अपने वंशज कर रहे हैं। वो दरअसल नफरत के चक्कर में गांधी के अपमान के मकसद से बनाई इन बातों को लोगों के बीच ज्याद प्रचारित कर रहे हैं। इसी बात से आश्चर्य चकित होकर मैं गांधी जी के इन वंशज की टाइम लाइन पर गया और वहां जाकर तो मेरी हैरानी की सारी हदें टूट गईं।
गांधी जी के प्रपोत्र तुषार गांधी के नाम पर बने प्रोफाईल में 27 मार्च को
ये कवर फोटो अपडेट किया गया था।


27 मार्च को तुषार अरुण गांधी ने फेसबुक पर अपना कवर फोटो चेंज किया था। उन्होंने पाकिस्तान के झंडे को अपना कवर फोटो बनाया था। ऐसा उन्होंने क्यूं किया ये तो बापू ही जानते होंगे लेकिन उनकी इस हरकरत ने कुछ दिन पहले लिखे मेरे एक और ब्लॉग की याद दिला दी। बिहार में एक महिला के द्वारा पाकिस्तान का झंडा फहराने को लेकर बहुत बवाल हुआ था। अनपढ़ों और गंवारों की क्या बात करें, हमारे बापू के घर के लोग ही जब इस तरह की हरकत करने में लगें हैं तो हम किसे मुंह दिखाएं? उनकी नाथूराम गोडसे से नफरत को समझा जा सकता है लेकिन पाकिस्तान के झंडे से मुहब्बत को क्या समझा जाए? क्या इसे भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहेंगे? यदि ऐसा है भी तो फिर गोडसे की मैग्जीन में छपे गांधी जी के कार्टून में उन्हें क्या बुराई लगती है? ये बातें साफ करती हैं कि गांधी किसी के खून या नाम में नहीं बसते।