शुक्रवार, 16 मार्च 2018

आत्म जगत या चेतना जगत कैसा होता है? क्या मृत्यु के बाद भी कुछ रहता है? स्वामी गंगाराम जी के उत्तर

मृत्यु के बाद क्या होता है? ये एक ऐसा प्रश्न है, जो ज्यादातर लोगों के लिए एक अनसुलझी
पहेली ही बना रहता है। अज्ञानतावश हमने इस जगत की कई कपोल कल्पनाओं या किस्से
कहानियों को ही सत्य मान लिया है। हमारे उपनिषद सूक्ष्म जगत का विश्लेषण करते हैं।
वैज्ञानिक भी सदैव से सूक्ष्मतर विषयों पर से परदा उठाने की कोशिश करते रहे हैं।
सूक्ष्मतम जगत का अंत निश्चित तौर पर एक ऐसी अवस्था पर होगा जहां कुछ भी शेष न रह
जाए, लेकिन वहां तक भौतिक संसाधनों से पहुंच पाना शायद कभी संभव न हो पाए।
स्वामी
गंगाराम आत्म जगत का विश्लेषण सूक्ष्म जगत के अनुसंधान से करते हैं।




वे कहते हैं, जल की तीन अवस्थाएं हैं ठोस, द्रव्य और वाष्प। ठोस में
जड़ता अधिक है, द्रव्य में उससे कम और वाष्प में उससे कम। जो जितना सूक्ष्म या कम
जड़ता वाला है वो उतना शक्तिशाली है। पत्थर में जीवन शक्ति नहीं है, पानी में है
और वाष्प में उससे भी ज्यादा। निश्चित तौर पर इस अवस्था से भी कई गहरी सूक्ष्मतम
अवस्थाएं हैं जिन तक विज्ञान नहीं पहुंच सकता लेकिन हम पहुंच सकते हैं।

विज्ञान जब हिग्स बोसोन की खोज में पसीना बहा रहा है तब आप उससे भी
सूक्ष्म विचार जगत का अनुसंधान अपने भीतर ही कर सकते हैं। ये विचार और इससे बने बुद्धि
और मन से जीव की रचना होती है और यही जीव आत्म तत्व का आवरण बन जाता है। यदि वासना
रहित जीवन से विचारों को शुद्ध नहीं किया जाता है और आत्म तत्व को जीव से मुक्त
नहीं किया जाता है तो वो शरीर के बाद भी अपनी वासनाओं के साथ विचरण करता है और नई
योनी की तलाश करता है। जैसी वासानाएं शेष रहती हैं वैसा ही शरीर दोबारा मिलता है।
यदि इच्छारहित होकर आत्म तत्व को परमात्व तत्व में विलीन होने दिया जाए तो कैवल्य,
मोक्ष या ब्रह्म आदि शब्दों से निरुपित की गई अवस्था की प्राप्ति हो जाती है। जब
तक देह में हैं तब तक तो ज्ञानी या सत्य को प्राप्त व्यक्ति भी भौतिक जगत में अपने
भौतिक शरीर को लेकर दंड ही भोगता है। पहले जीव और फिर देह समाप्त होगी इसके बाद ही
परमात्मा में विलय होगा। कबीर कहते हैं,
देह धरे का दंड है, सब काहू को होय


ज्ञानी भुगते ज्ञान से, मूरख भुगते रोय


बुधवार, 28 जून 2017

अद्भुत, अविस्मरणीय, महाकाल की कृपा से हुई एक मुलाकात का संक्षिप्त संस्मरण

बापू का हस्त लिखित असली पत्र, प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू के लिखे पत्र, सुभाष बाबू की उज्जैन में ली गई दुर्लभ तस्वीर ये सारी चीजें एक साथ देखने को मिल जाएं तो आपका बल्लियों उछल जाना लाजिमी है।
बापू (महात्मा गांधी) द्वारा लिखे गए पत्र की मूल प्रति

मेरे साथ भी आज यही हुआ। जब एक बड़े सरकारी अधिकारी के कैबिन में एक अनौपचारिक मुलाकात के लिए घुसा तो हाथ में अपनी दो किताबें थी। लेखक हूं, पत्रकार हूं, ये हूं वो हूं का बहुत सारा पानी चढ़ा हुआ था। थोड़ी देर ही हुई कि सारा पानी उतर गया। बैठने के बाद एक किताब देखकर हैरान रह गया। 

भगत सिंह की जेल डायरी, ये मेरे पिता की किताबों के कलेक्शन में बहुत सालों से है। जिस शख्स से मिलने गया था जानता भी नहीं था कि वो इसके रचयिता हैं। यही नहीं अब तक करीब साठ किताबें लिख चुके हैं। भगत सिंह और स्वामी विवेकानंद पर लिखी गई उनकी वृहद रचनाएं ज्ञानपीठ लगातार छाप रहा है। धर्मयुग के लेखक तो रहे ही साथ ही जिस जमाने में लोग मीडिया नहीं जानते थे तब वे रशिया और जापान के प्रतिष्ठित अखबारों से जुड़ चुके थे।

राजेंद्र बाबू (राजेंद्र प्रसाद जी) द्वारा लिखे
गए पत्र की मूल प्रति

ये सब तो एक शख्स को शख्सियत बना ही देता है लेकिन जैसे ही आप जानते हैं कि वो एक समृद्ध विरासत और धरोहर को आगे बढ़ा रहे हैं तो उत्साह दो गुना हो जाता है। जब जाना कि देश की आजादी का दिन और वक्त उनके पिता ने तत्कालीन बड़े नेताओं के बीच बैठकर निकाला था तो खुद के सौभाग्यशाली होने का और अनुभव हुआ। सिर्फ बातों तक ही बातें सीमित नहीं रहीं बल्कि वो सारा पत्राचार भी मेरे सामने था जो बापू, राजेंद्र बाबू, मोरारजी और कई अन्य बड़े नेताओं और उनके पिता के बीच हुआ था। कालीदास की धरोहर और विक्रमादित्य की शान को बनाए रखने और बचाए रखने में भी जिनका अविस्मरणीय योगदान था। 
मैं बात कर रहा हूं आधुनिक युग के आर्यभट्ट कहे जाने वाले महान ज्योतिष पं. सूर्य नारायण व्यास जी की और आज मुलाकात हुई उनके यशस्वी और अत्यंत ओजवान पुत्र राजशेखर व्यास जी से। 
आधुनिक युग के आर्यभट्ट पं. सूर्यनारायण व्यास जी


गागर में सागर वाली मुलाकात थी ऐसा लगा कि आज, महाकाल के उपासक रहे पं. सूर्य नारायण व्यास जी का ही आशीर्वाद मिल गया हो। पिताजी को फोन पर जानकारी दी तो ये जानकर और अच्छा लगा कि पिताजी खुद पं. का आशीर्वाद लेने कई बार उज्जैन जा चुके थे। आज की पीढ़ी को ऐसे लोगों के बारे में ज्यादा से ज्याद जानने की आवश्यकता है उम्मीद है मैं इसमें अपना कुछ योगदान दे पाऊंगा। वाह अद्भुत अविस्मरणीय। 

पं. राजशेखर व्यास जी से आशीर्वाद लेते हुए                  पं. जी पर डाक टिकट जारी करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री
                                                                    श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

पद्म श्री डॉ. नरेंद्र कोहली के सत्य की खोज पर विचार

आप किसी को गुरु माने से ज्यादा आवश्यक है योग्य गुरु आपको शिष्य मानें.. आध्यात्मिक जगत में स्वामी गंगाराम जी ने ये सौभाग्य दिया तो लेखक के तौर पर साहित्य जगत में वर्तमान दौर के सबसे प्रतिष्ठित नाम और पद्म श्री से सम्मानित किए गए डॉ. नरेंद्र कोहली का प्रेम और आशीर्वाद सदा मिलता रहा है.. सत्य की खोज किताब की शुरुआत में कुछ अध्याय उन्हें भेजे थे। जिन्हें उनका स्नेह प्राप्त है वो जानते हैं कि उनकी हास्य विनोद की क्षमता अप्रतिम है। उन्होंने कहा बड़ी जल्दी वो काम कर रहे हो जो हमें करना चाहिए। फिर कहा कुछ लिखकर भेजूंगा। वो सिर्फ औपचारिकता में किसी आलेख या पुस्तक को नहीं पढ़ते बल्कि पूरा समय देकर गंभीरता से उस पर विचार करते हैं। ऐसी ही अपेक्षा उनकी अपनी पुस्तकों को लेकर भी रहती है। उन्होंने जो मेल कुछ दिनों बाद भेजा वो भी किसी बड़े सम्मान से कम नहीं था। उसे अपने पास संजोकर रखा है। आज जब उनके शुभचिंतक उन्हें पद्म श्री मिलने की खुशियां मना रहे हैं.. उनके मेरे लिए कहे गए ये शब्द और भी अहम लग रहे हैं। अपनी बढ़ाई किस को पसंद नहीं और फिर वो डॉ. कोहली के शब्दों में हो तो क्या बात। हम ही क्या हमारे पिताजी भी नरेंद्र कोहली जी के साहित्य को अपनी धरोहर समझते रहे हैं और जब उनके शब्दों में अपने किसी लेखन की तारीफ मिले तो अहसास क्या होगा, शब्दों में बयां करना मुश्किल होगा। राज्य सभा टीवी के कार्यक्रम शख्सियत में उनके बारे में मुझसे भी विचार लिए गए और इस कार्यक्रम में उन्होंने जो बात मेरे बारे में कही वो भी दिल को छू लेने वाली थी.. ये कार्यक्रम तो इंटरनेट पर आपको मिल जाएगा.. फिलहाल उनका भेजा वो मेल साझा कर रहा हूं जो उन्होंने सत्य की खोज की शुरुआत में मुझे लिख कर भेजा था।